Home News सुहागिनें जो हलदी-कुमकुमका दान देती हैं, उसे ‘उपायन देना’ कहते हैं

सुहागिनें जो हलदी-कुमकुमका दान देती हैं, उसे ‘उपायन देना’ कहते हैं

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इस दिन सूर्यका मकर राशिमें संक्रमण होता है । सूर्यभ्रमणके कारण होनेवाले अंतरकी पूर्ति करने हेतु प्रत्येक अस्सी वर्षमें मकर संक्रांतिका दिन एक दिन आगे बढ जाता है । संक्रांति को देवता माना गया है । ऐसी कथा प्रचलित है, कि संक्रांति ने संकरासुर दानवका वध किया ।इस दिन सूर्यका उत्तरायण आरंभ होता है । कर्क संक्रांति से मकर संक्रांति के कालको दक्षिणायन कहते हैं । जिस व्यक्ति की उत्तरायण में मृत्यु होती है, उसकी अपेक्षा दक्षिणायन में मृत्युको प्राप्त व्यक्ति के लिए, दक्षिण (यम) लोकमें जानेकी संभावना अधिक होती है ।

‘मकर संक्रांतिपर सूर्योदय से लेकर सूर्यास्ततक पुण्यकाल रहता है । इस कालमें तीर्थस्नानका विशेष महत्त्व हैं । गंगा, यमुना, गोदावरी, कृष्णा एवं कावेरी नदियोंके किनारे स्थित क्षेत्रमें स्नान करनेवाले को महापुण्य का लाभ मिलता है ।

मकर संक्रांति से रथसप्तमी तक का काल पर्वकाल होता है । इस पर्वकाल में किया गया दान एवं पुण्यकर्म विशेष फलप्रद होता है । धर्मशास्त्र के अनुसार इस दिन दान, जप और धार्मिक अनुष्ठानों का बहुत महत्व होता है । इस दिन दिया गया दान पुनर्जन्म के बद सौ गुना प्राप्त होता है ।

नए बर्तन, वस्त्र, अन्न, तिल, तिलपात्र, गुड, गाय, घोडा, स्वर्ण अथवा भूमिका यथाशक्ति दान करें । इस दिन सुहागिनें दान करती हैं । कुछ पदार्थ वे कुमारिकाओं से दान करवाती हैं और उन्हें तिलगुड देती हैं ।’ सुहागिनें जो हलदी-कुमकुमका दान देती हैं, उसे ‘उपायन देना’ कहते हैं ।

उपायन देना’ अर्थात तन, मन एवं धनसे दूसरे जीवमें विद्यमान देवत्वकी शरणमें जाना । संक्रांति-काल साधनाके लिए पोषक होता है । अतएव इस कालमें दिए जानेवाले उपायन से देवताकी कृपा होती है और जीवको इच्छित फलप्राप्ति होती है ।

आजकल साबुन, प्लास्टिककी वस्तुएं जैसी अधार्मिक सामग्री उपायन देनेकी अनुचित प्रथा है । इन वस्तुओंकी अपेक्षा सौभाग्यकी वस्तु, उदबत्ती (अगरबत्ती), उबटन, धार्मिक ग्रंथ, पोथी, देवताओं के चित्र, अध्यात्मसंबंधी दृश्यश्रव्य-चक्रिकाएं जैसी अध्यात्मके लिए पूरक वस्तुएं उपायनस्वरूप देनी चाहिए ।

मकर संक्रांतिके लिए सात्त्विक वस्तुएं भेंट करनेसे आध्यात्मिक लाभ होता हैं । एक सौभाग्यवती स्त्रीका दूसरी सौभाग्यवती स्त्रीको उपायन (भेंट) देकर उसकी गोद भरती हैं ।

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