बचपन से संक्रान्त का इंतज़ार रहता था, दादी और अम्मा तीन चार दिन पहले से ही चूड़ा ( नमकीन ), लड्डू, इत्यादि बनाना शुरू कर देती थीं और तिल कूट के दादाजी के लिए लड्डू बनाये जाते थे या पट्टी जिसे हम भी खाते थे.
त्यौहार के दिन पानी में तिल डालकर नहाया जाता था और उसके बाद ही लड्डू या अन्य खाने पीने की चीज मिलती थी, शनैः शनैः परम्पराओं पर आंशिक ग्रहण सा लगा और त्यौहार के प्रति उपेक्षा देखी गई, बच्चों को संक्रांत पतंग उड़ाने का अवसर लगने लगा और मिठाई बाहर से आने लगी.
डोमिनो, स्विगी, इत्यादि का प्रयोग करके बच्चे मैगी से पिज़्ज़ा के रास्ते मोमोस पर आ गई.
इस ह्रास का जिम्मेदार नई पीढ़ी नहीं बल्कि हम लोग रहे जो थोड़े से आलस में अपनी सांस्कृतिक परम्पराओं को घुलते देखते रहे, यदि आज मैं दादी की या अम्मा की बात कर रहा तो निश्चित तौर पर हमारी पीढ़ी ने रेडीमेड का तरीका अपनाया है, कुछ परिवार ने परंपरा कायम रखी है तो उसका अंतर भी उन्हें अपने परिवार में दिख रहा होगा।
दरअसल घर में जब उत्सव मनाने का काम हो और दो तीन दिन से माहौल बने तो उत्सुकता रहती है, इंतज़ार रहता है लेकिन चुपचाप किये हुए आर्डर में चुपचाप ही सामान आता है और बच्चे महज एक दिन के नाम पर इसे निभा लेते है, पता नहीं कितने तिल डालकर नहाते भी है या नहीं ! हाँ पतंग का इंतज़ार रहता है लेकिन चीन के मांझे के डर से कहीं ये भी किसी षड्यंत्र की भेंट न चढ़ जाए.
बच्चों को जन्म से यदि इन सब गतिविधियों में न डाला जाए और ये कहा जाए आजकल के बच्चों को कुछ पता नहीं तो ये बच्चो के साथ ज्यादती है. आज आपको थोड़ा पीछे जाना होगा, दुनिया ख़त्म नहीं होती है थोड़ा रुकने पर, परंपरा और त्योहारों का महत्त्व और उत्साह यदि जीवित रखना है तो प्रयास करने होंगे, परिवार को एक साथ रखना है तो प्रयास करने होंगे।
भले ही सांकेतिक रूप से तैयारी करें लेकिन करें जरूर, हर त्यौहार की तैयारी अपने अपने सामर्थ्य से करें। संस्कार यूँ ही नहीं दिए जाते, आत्मसात करने के लिए प्रयास भी किये जाते है. मकरसंक्रांति और उत्तरायण की अनेकानेक शुभकामनायें।






