मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के तहत वोटर लिस्ट में नामों के सत्यापन ने इस समुदाय में डर बढ़ा दिया है.
एक ओर नागरिकता के बारे में इनमें से कई लोग अनिश्चय में हैं. दूसरी ओर, यह भी डर है कि कहीं वे मतदाता बनने से भी छूट न जाएँ.
इन सबके बीच, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) मतुआ समुदाय तक पहुँच बढ़ाने और उन्हें अपने साथ बनाए रखने की कोशिशों में जुटी हुई है.
मतुआ समुदाय को बीजेपी के लिए एक अहम मतदाता आधार माना जाता है.पश्चिम बंगाल में इनकी आबादी का अनुमान क़रीब दो करोड़ तक लगाया जाता है. इसकी वजह से यह समुदाय राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.
पश्चिम बंगाल में एसआईआर के तहत ड्राफ़्ट मतदाता सूचियों से 58 लाख से ज़्यादा लोगों के नाम हटाए गए हैं.
कोलकाता स्थित शोध संस्था साबर इंस्टिट्यूट के आँकड़ों के मुताबिक़, ड्राफ़्ट मतदाता सूची से मतुआ बहुल 15 विधानसभा सीटों में क़रीब 2.4 लाख मतदाताओं के नाम हटे हैं.
इनमें से क़रीब 40% के नाम मृत बताए गए लोगों के थे. लगभग 39% लोग पलायन कर गए हैं और लगभग 22% का पता नहीं चल पाया.
इनमें बड़ी संख्या ऐसे मतदाताओं की बताई जा रही है, जिनकी पहचान ‘अनमैप्ड’ के रूप में की गई है.
‘अनमैप्ड’ उस स्थिति को कहा जाता है, जब किसी मतदाता का रिकॉर्ड किसी पते या मतदान क्षेत्र से सही तरह से जोड़ा नहीं जा पाता.
इससे मतुआ समुदाय में मताधिकार को लेकर डर और गहरा हो गया है.
लोगों को आशंका है कि अगर इस बार उनका नाम मतदाता सूची में नहीं आया और सीएए की प्रक्रिया में देरी हो गई, तो उन्हें स्थानीय निवासी नहीं माना जाएगा.
उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना, नदिया और उत्तर बंगाल के कई इलाक़ों में फैले मतुआ परिवारों का कहना है कि उन्हें अब भी यह स्पष्ट नहीं है कि उनकी नागरिकता की स्थिति क्या है और क्या वे 2026 के चुनाव में मतदान कर पाएँगे?
इनका दावा है कि वे पहले के चुनावों में वोट दे चुके हैं.
मतुआ बहुल इलाक़ों के लोगों से बातचीत के दौरान यह सवाल बार-बार सामने आता है कि अगर नागरिकता संशोधन क़ानून की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है तो क्या उन्हें ‘अस्थायी नागरिक’ माना जा रहा है? आने वाले बंगाल चुनावों में ये महत्वपूर्ण दिशा होगी।






