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अपनी बात गिरीश मिश्र – हाँ मैं हिंदुस्तान हूँ, कभी कभी रोता हूँ अपने अराजक कपूतों पर

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सुअर जैसे गू खाकर बौराता है वैसे ही अराजक को किसी भी तरह के समर्थन से उपजी उसकी विकृत मानसिकता बौरने पर मजबूर कर देती है. महाराष्ट्र में राज ठाकरे हो, छत्तीसगढ़ में पूर्वमुख्यमंत्री हों, संजय राउत हों या स्टालिन का लड़का हो वे सब इस देश के उस भाग जिसमें वे रहते है तो समझते है कि वो भाग उनके बाप का है ! मुंबई मछली पकड़ने वालों का था, सात द्वीप थे उन्हें मिलाकर मुंबई को आकर दिया गया, अब राज ठाकरे अन्नामलाई जैसे पढ़े लिखे विशुद्ध भारतीय को भड़वा कहें कहाँ तक उचित है ? देश का दुर्भाग्य है जब तमिलनाडु में हिंदी की उपेक्षा होती है और उत्तर भारतियों पर ऊलजलूल बातें होती है तो हम राजनीति कहकर मुंह फेर लेते है, ये प्रयास नहीं करते की साफ़ सन्देश नागरिकों द्वारा भी दिए जाएँ।
ऐसा नहीं है कि ये आज की समस्या है, ये समस्या फैलाई गई है जान बूझकर और सुप्त नागरिकों ने इसे मौन रहकर हवा दी है. जब छत्तीसगढ़ का निर्माण हुआ था, भूपेश बघेल ने सन २००० में विजय जुलूस निकाला था, दुर्ग जिले से जीता एक नेता रायपुर के बाजारों में अपना विजय जुलूस निकाल रहा था, इसी जुलुस में गैर छतीसगढ़ियों के लिए अपमानजनक नारे लगाए गए, कांग्रेस के शासन में घृणा की ये राजनीती फली फूली और उस समय के एक पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविन्द नेताम ने छटवी अनुसूची का उदाहरण देते हुए आदिवासी और गैर आदिवासी के बीच खाई खोद डाली।
छत्तीसगढ़ का कुर्मी समाज प्रतिष्ठित लोगों के रुप में जाना गया लेकिन भूपेश बघेल ने मंत्री बनते ही सवर्णों के प्रति इतना जहर भरा कि उसका असर अब आम तौर पर दिख रहा है, बघेल के पिता जी ने पुस्तक लिख डाली “रावण को मत मारो” छत्तीसगढ़ के एक सेवानिवृत पुलिस महानिर्देशक आर एस एल यादव को भी जातीय घृणा फैलाने का श्रेय जाता है, समरसता दिखाने नागरिकों ने कई बार रैलिया निकाली लेकिन ये जातिवाद की मानसिकता लिए लोग कुकुरमुत्ते की तरह फैलते रहे और इन्हें राजनैतिक पोषण, संरक्षण मिलता रहा.
अमित बघेल ने भी अभी इसी तरह का एक आंदोलन चलाया और उसकी गिरफ्तारी हुई, बात यहाँ तक नहीं है, कुर्मी समाज के भोले भाले लोगो को भड़का कर अब ये बात सुदूर ग्रामों में हो रही की बाहर वाले हमारे लोगो की नौकरी और धंधे ले रहे. अमित बघेल के आंदोलन को हलके में नहीं किया जा सकता, यदि आप गुप्तचर संस्थाओं से पूछें की सरकारी अधिकारयों जिनमे पुलिसकर्मी भी शामिल हैं में ये भावना है की नहीं ! वे कहेंगे बिलकुल है।
हाल में ही एक पुलिस अधिकारी ने हिन्दू धर्म के बारे में गलत कहा और मंदिरों में होने वाले भेदभाव पर बात की जो अनर्गल थी, आज के दौर में राम मंदिर में मुसलमान घुसकर नमाज पढ़ने की जुर्रत भी कर सकता है तो फिर आप तो हिन्दू हो !

संघ प्रयास कर रहा हिन्दू एकत्रित हों लेकिन ये नील पंख लगाए नेता पूरी कोशिश कर रहे हिन्दू अलग थलग रहें। मणिशंकर अय्यर से लेकर, कांग्रेस के अनेक नेता हिन्दू धर्म को हमेशा नीचे गाड़ देने के प्रयास करते है लेकिन ऐसा होता नहीं। गजनी को दोष तब दें जब देश के अंदर के हिन्दू गद्द्दार दोषी न हों.

सोचिये यदि तमिलों पर देश के किसी हिस्से में हमला हो, फिर तमिलनाडु में मराठियों पर हो या गुजरातियों पर हो तो कैसे हिन्दुस्तान की कल्पना हम विश्व की तीसरी बड़ी आर्थिक शक्ति बनते हुए कर रहे ? ट्रंप गया तेल लेने पहले अपने अंदर के कुत्सित मानसिकता लिए लोगों को तो ठीक करो चाहे वो ममता हो, कांग्रेस के हों, हिन्दू हो, अनाप शनाप बोलने वाले ठाकरे हों या कोई भी।

कुर्मी क्या छत्तीसगढ़ के मूल निवासी है ? नहीं वे उत्तर प्रदेश से आये हुए लोग है, छत्तीसगढ़ में आदिवासी, गोंडी इत्यादि रहते थे, कलचुरी राजा का शासन था यहाँ और मराठाओं के सरदारों का सूबा रहा है ये, फिर बकवास !

समय रहते इन दीमकों का इलाज नहीं हुआ तो देश को बाहर से नहीं अंदर से खतरा है. सरकार अंदर कड़ाई से इन बेखौफ अपराधियों का इलाज करे।

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