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अपनी बात – सनातन के दुश्मन कौन ? कभी कभी अंतरात्मा का अवलोकन भी जरुरी – गिरीश मिश्र

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ये बात नहीं है कि किसी को पता नहीं लेकिन चूँकि मामला अपने धर्म और अपनी आस्था से जुड़ा हो तो आदमी मन मसोस के बोलता नहीं। लेकिन आपको अब जब सामूहिक चेष्टा से सनातन की पुनर्स्थापना की कोशिश में संत महात्मा, सरकार लगी हो तब कुछ ऐसा जो सनातन की धुरी घुमाता हो में हो रहा हो जिससे आने वाले बच्चे मंदिर से मुंह मोड़ लें तो हम जैसे लोगों को खड़ा होकर कहना पड़ता है सब कुछ ठीक नहीं।
मानता हूँ कॉरिडोर बनाये, मंदिर स्थापना की लेकिन यदि आज का युवा vip कल्चर देख कर मंदिर के बारे में धारणा बनाने लगे तो फिर आपकी सारी कोशिशें बेकार है. अभी हाल ही मैं महाकाल और ओंकारेश्वर मान्धाता के दर्शन पाकर आया और जरुरी समझा तो लिख रहा ताकि सरकार और प्रशासन आज के बाद ये न बोले हमें बोले क्यों नहीं ! तो सुनिए यदि थोड़ी बहुत आत्मा बची हो तो.
मंदिर में सब ठीक, टिकिट लेने के बाद जगह जगह चेकिंग ठीक लेकिन कभी कभी उनका बुजुर्गों से व्यवहार ठीक नहीं और ये पुलिसकर्मी नहीं बल्कि मंदिर प्रशासन द्वारा दी हुई निजी सिक्युरिटी जैसे महाकाल में क्रिस्टल जैसी है. हो सकता है भीड़ का संतुलन बनाने में तकलीफ हो लेकिन बत्तमीजी किसी हालत में भी किसी भक्त से नहीं की जानी चाहिए. वे पैसे दे रहे आपकी व्यवस्था के लिए दर्शन करने और यदि आपको लगता है कि आपको अधिकार है बत्तमीजी का तो एकाध दिन कोई ऐसी घटना होगी जिसे आप फिर भक्तों के सर मढ़कर अपनी लाचारी व्यक्त करेंगे।
vip दर्शन हर छोटा बड़ा आदमी जुगाड़ लगाकर पा लेता है, बस फर्क ये है की कभी कभी पैसा भी vip को पीछे छोड़ आगे बढ़ा देता है. ओंकारेश्वर का भी यही हाल है यहाँ बत्तमीजी तो नहीं कह सकते लेकिन यहाँ व्यवस्था चरमराई हुई है, १८५ किलोमीटर इंदौर से ओंकारेश्वर का रास्ता है लेकिन पूरे ९ घंटे लगे पहुँचने में, सड़क निर्माण हो रहा है लेकिन चोरल घाट पर जाम सिर्फ ट्रैफिक की व्यवस्था सही न हो पाने के कारण सा दिखा. पुलिस वाला बचता नजर आया व्यवस्था के बीच. ओंकारेश्वर में भी लचर व्यवस्था और सिर्फ पुलिस ही क्यों जिम्मेदार ? कलेक्टर को स्वयं देखना चाहिए कि इतने लोगों की आस्था का केंद्र और रेवेन्यू देने वाला स्थान कैसा है ! कलेक्टर को जाकर देखना चाहिए एक आम आदमी जैसे की व्यवस्था कैसी है तब पता चलेगा धरातल पर आकर व्यवस्था कैसी है.
ऐसे में लोग मंदिर आने जाने से बचते है और बाकी लोगों को मना करते है आने. फिर इन जगहों पर कोई कब्ज़ा करेगा तो उदासीन बनकर चुपचाप सरकार से उम्मीद करोगे उस स्थान को मुक्त कराये और आप मुक्ति होने के बाद आराम से सो जाओगे। शायद इसीलिए बाहर के लोगों ने आपकी मानसिकता समझते हुए आपके मंदिरों के आस पास कब्ज़ा किया और एक दिन आएगा आप मंदिर नहीं जा पाओगे और शायद जरुरत भी न पड़े क्योकि आप भी उस समय उसी हुजूम का हिस्सा होंगे जो कल हिन्दू था और आज विजातीय होकर आपको गरिया रहा है.
अभी समय है सँभालने का, बटेंगे और कटेंगे को पहचानने का. खड़े हों

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