स्मृति शेष पं बबन प्रसाद मिश्र :- अपनी बात गिरीश मिश्र

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    आज मेरे स्व पिता बबन प्रसाद मिश्र का जन्मदिन है, पिछले एक दशक से ज्यादा तक हम उनके जन्मदिन पर रायपुर में कार्यक्रम करते आये क्योकि माताजी को ये बहुत अच्छा लगता था. माता जी के जाने के बाद एक कार्यक्रम हुआ लेकिन जैसा कि होता है हर कार्यक्रम को आगे ले जाने में बहुत से संसाधन लगते है, ऐसा नहीं कि मैं कुछ लोगों से संपर्क करूँ और कार्यक्रम न हो लेकिन जब इस कार्यक्रम को हमने किसी और दिशा में जाते देखा तो थोड़ा विराम लगा दिया।
    हमें इस बात का कोई मलाल नहीं क्योकि हमारे पिता ने सबसे पहले कोई शिक्षा दी थी तो वह थी आत्मसम्मान की और हमने कोशिश की कि उनके इस नाम को लेते हुए हम किसी तरह का कोई भी फायदा न उठायें। न हमने किसी नेता से या किसी संस्था से सहयोग अपेक्षित किया न ही किसी के पास गए, हाँ कुछ लोग स्वेच्छा से हमारे साथ जुड़े और उन्हें हमारा परिवार ह्रदय की गहराइयों से आभार प्रकट करता है.
    इस दिन मैं उन्हें भी धन्यवाद दूंगा जो संगवारी परिवार के कार्यक्रम में पिताश्री के नाम से रायपुर पधारे जिनमे स्व वेद प्रकाश वैदिक, श्री अवनिजेश अवस्थी, श्री सुशिल पंडित श्री बृजमोहन अग्रवाल, महंत जी, श्री प्रमोद दुबे, श्री गिरीश पंकज सहित अनेक पत्रकारों का और अतिथियों का सम्मान करने का अवसर मिला और उन्होंने पार्टी लाइन से अलग हटके पिताश्री के प्रति जो सम्मान व्यक्त किया वो अविस्मरणीय है.
    न जाने कितने पत्रकारों के गुरु रहे हमारे स्व पिता ने न सिर्फ ईमानदारी पत्रकारिता की मिसाल कायम की बल्कि हम सब को जिसमे मेरे दो अनुज और दो बहनो सहित उन संस्कारों में पिरोया कि हम सब उनके आदर्शों की छत्र छाया में पल बढ़कर जो मिला उसी से आज वो बन पाए जो हैं. पिताश्री चाहते तो बहुत कुछ कर सकते थे हम सब के लिए जिसे आज के दौर में संपत्ति या व्यवसाय से जाना जा सकता है, लेकिन ईमानदार कलम ने इससे बढ़कर जो दिया वो यही कि हम अपनी रीड की हड्डी दिखते हुए समाज में दृढ़ता से खड़े रहें।
    आज उनके और माता जी के आशीर्वाद से सारे बच्चे उसी तरह नाम ऊँचा कर रहे जैसे अपेक्षित है पंडित बबन प्रसाद मिश्र के परिवार से.

    अपने पिता को स्मरण करते हुए मैं धन्यवाद दूंगा पापा के पूरे परिवार को जिन्होंने इस बात का ध्यान रखा कि किसी भी तरह पापा के नाम पर कोई ऊँगली न उठाये और मुझे गर्व है अपने भाई, बहन और उनके परिवार पर. हमने युगधर्म के बंद होने से लेकर संघ के कुछ लोगों तक पापा के अंतर्द्वंद्व को देखा है, ये भी देखा है कैसे अवसरवादी लोगों ने उनका फायदा, उनके नाम का फायदा उठाया और उनके सामने ही गायब हुए, हमने ये भी देखा है कैसे उन्होंने एक उदण्ड प्रेसमालिक के घमंड को चूर चूर किया और हमने ये भी देखा कि पटवा जी से लेकर सारंग जी तक हमारे पिता का आत्मसम्मान कैसे टिका रहा.

    आज जब स्मृति शेष है तब संस्मरण बहुत हैं, फिर कभी,उनके बारे में जो भी आज लिख रहे मैं उन्हें अपने परिवार की ओर से धन्यवाद देता हूँ।

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