छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में अवैध कब्जे नए नहीं है, रसूखदारों और नेताओं की यह पारम्परिक प्रथा रही है कि प्रशासन की लचर व्यवस्था और स्वार्थ के चलते अपनी आय बढ़ाओ और इसका सबसे बड़ा जरिया बनता है शासकीय जमीन जहाँ एक ओर आम आदमी से सरकारी तंत्र वैध दस्तावेज रहते हुए भी प्रमाण मांगता है और तब तक मांगता है जब तक भेंट न चढ़ जाए और दूसरी ओर कही तालाब खा जाता है, कही शहर गली मोहल्ले के नुक्कड़ या ऐसी सड़कों का किनारा जो मुख्य सड़क से थोड़ी अंदर होती है.
शहर की सुंदरता और यातायात को टाक में रखकर ये लोग किसी पार्षद, विधायक के संरक्षण में कब्जे करते है और बाकी रही सही कसर मुलिस या निगम की टीम पूरी कर देती है.
उदाहरण के लिए मंत्रियों के बंगलों के पीछे जो शंकर नगर वाली सड़क है पर पान का ठेला खुल गया, इधर तेलीबांधा से अवन्तिनगर आने वाले रास्ते पर जो शंकर नगर तरफ जाता है और इधर अवन्ति विहार तरफ आता है पर अवैध ठेलों के साथ साथ तालाब के सामने दो दुकाने और उनकी साइड में कबाड़ियों का अस्थाई ढांचा लग गया है, इसी के सामने से एक नै सड़क निकली है जो वापस मेन रोड टच करती है. आश्चर्य तब हुआ जब मैंने एक पुलिस की गाडी यहाँ कल दोपहर रुके देखी और भेंट लेते हुए एक व्यक्ति दिखा जो वर्दी में था.
इसके सामने एक खम्बे ओर सफ़ेद पोतकर चबूतरा भी बनाया गया था जो शायद तोडा गया लेकिन खम्बा खड़ा था और इस बार घासीदास जयंती पर पुनः इसके आजु बाजू परकोटा बना दिया गया.
इसी तरह कनाल रोड पर राजातालाब जाने वाली सड़क के किनारे ठेले लगे रहते है और अक्सर झड्प होते रहती है.
जब तक अनुशासन नहीं रहेगा ये चलेगा और दंडात्मक कार्यवाही नहीं होगी ये बना रहेगा। हर गली नुक्कड़ अवैध ठेले खुले हुए है, ये न सिर्फ ट्रैफिक का कारण बनते है बल्कि अवैध गतिविधियों के संचालन का हिस्सा भी.
नगर निगम और प्रश्रय देने वाले लोगो को सोचना होगा वे क्या कर रहे ! बात रही गरीबो के ठेले की तो इनको उचित स्थान दिया जाए न कि पुल की नीचे या गली मोहल्ले में कब्ज़ा करने दिया जाए या अवैध बसाहट को निमंत्रण दिया जाए.






