भारत की विदेश नीति इस समय सबसे मजबूत स्थिती में है. NSA अजीत डोभाल से लेकर विदेश मंत्री एस जयशंकर तक विदेश में भारत का डंका बजा रहा है. चाहे पाकिस्तान को आंख दिखाना हो या फिर शांति का संदेश हो. दोनों ने भारत का रूख पूरी दुनिया में जबरदस्त तरीके से रखा है. सबसे दिलचस्प यह है कि भारत की विदेश नीति इन दिनों सिर्फ बड़े देशों के साथ रिश्तों तक सीमित नहीं रह गई है. भारत जितना बड़े देशों के साथ अपनी नीति आगे बढ़ा रहा है उतना ही छोटे देशों का भी ध्यान रख रहा है. विदेश मंत्री एस जयशंकर की हालिया कूटनीतिक गतिविधियों में इसका एक बड़ा संकेत दिखाई दे रहा है. एक तरफ वह घाना से अफ्रीका और ग्लोबल साउथ की जरूरतों की बात कर रहे हैं. दूसरी तरफ रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच भारत ने ऐसा युद्धविराम प्रस्ताव सामने रखा है जिसमें ऊर्जा और अनाज की सप्लाई के साथ समुद्री व्यापार को भी सुरक्षित रखने की कोशिश है. यानी फोकस सिर्फ युद्ध रोकने पर नहीं है. फोकस उन चीजों को चालू रखने पर भी है जिनका असर दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है. फ्यूल हो या खाना. खाद हो या वित्त. भारत इन सभी मुद्दों को एक ही बड़े कूटनीतिक फ्रेम में देख रहा है.
जयशंकर फिलहाल 6 से 10 अक्टूबर तक घाना, कोट डी आइवर और इथियोपिया की तीन देशों की यात्रा पर हैं. घाना में उन्होंने ग्लोबल साउथ के औद्योगिकीकरण के अधिकार और सप्लाई चेन को मजबूत करने की जरूरत पर जोर दिया. इसी बीच रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर भारत की एक तीन फैक्टर वाले युद्धविराम पहल भी सामने आई है. इसमें रिफाइनरी और दूसरी अहम सुविधाओं वाले स्ट्रक्चर पर हमले रोकने की बात है. ब्लैक सी के रास्ते अनाज और फ्यूल की आवाजाही जारी रखने की बात है. साथ ही व्यावसायिक जहाजों पर हमले रोकने का प्रस्ताव है. दोनों घटनाओं को साथ रखकर देखें तो भारत की कोशिश साफ दिखती है. वह ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूत करने के साथ अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों के लिए भी ज्यादा सक्रिय भूमिका निभा रहा है.
घाना के फॉरेन सर्विस इंस्टीट्यूट में बोलते हुए जयशंकर ने कहा कि मौजूदा अस्थिर दौर में कूटनीति का काम प्रतिस्पर्धा को टकराव में बदलने से रोकना है. उन्होंने भारत के आर्थिक बदलाव का भी जिक्र किया. उनके मुताबिक अर्थव्यवस्था से लेकर बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर और डिजिटल व्यवस्था तक भारत में बड़ा परिवर्तन हुआ है. देश में कारखाने लगाने और नए कारोबार शुरू करने की क्षमता भी बढ़ी है. जयशंकर ने राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत सप्लाई चेन से जोड़ा. उन्होंने कहा कि जरूरी सामान बनाने की क्षमता और तकनीकी क्षमता भी राष्ट्रीय सुरक्षा का हिस्सा है. भारत महत्वपूर्ण क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता को महत्व देता है. साथ ही दूसरे क्षेत्रों में सहयोग को भी आगे बढ़ाता है. यही संतुलन भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की सोच का हिस्सा है.
फ्यूल-फूड से फाइनेंस तक क्यों है फोकस?
- जयशंकर ने ग्लोबल साउथ के सामने मौजूद आर्थिक चुनौतियों पर खास जोर दिया. उन्होंने ईंधन, भोजन, खाद और पैसों की सप्लाई व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत बताई. साथ ही ग्लोबल साउथ के देशों के औद्योगिकीकरण के अधिकार की बात कही.
- उन्होंने भारत की विदेश नीति को रणनीतिक स्वायत्तता से जोड़ते हुए कहा कि साझेदारियां भारत के विकल्प बढ़ाने वाली होनी चाहिए. उन्हें भारत के विकल्प सीमित नहीं करने चाहिए. इसका मतलब यह है कि भारत किसी एक शक्ति समूह पर निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग देशों के साथ अपने संबंधों को आगे बढ़ाना चाहता है. अफ्रीका के साथ व्यापार से लेकर बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर और स्वास्थ्य तक भारत की भागीदारी इसी सोच का हिस्सा है.
- इसी कूटनीतिक सोच का दूसरा बड़ा उदाहरण रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर भारत की पहल है. भारत ने तीन हिस्सों वाला युद्धविराम प्रस्ताव रखा है. इसके तहत ऊर्जा प्रतिष्ठानों और दूसरी अहम बुनियादी सुविधाओं पर हमले रोकने की बात कही गई है. दूसरा हिस्सा ब्लैक सी के बंदरगाहों से अनाज और ऊर्जा की आवाजाही जारी रखने से जुड़ा है. तीसरे हिस्से में व्यावसायिक जहाजों पर हमले रोकने की बात है.
- यह प्रस्ताव यूक्रेन के नेतृत्व के सामने जयशंकर की सितंबर में हुई कीव यात्रा के दौरान रखा गया था. यूक्रेन के विदेश मंत्री एंड्री सिबिहा ने बाद में भारतीय प्रस्ताव को बड़ा बताया. उन्होंने कहा कि यूक्रेन अलग-अलग युद्धविराम प्रारूपों पर विचार करने को तैयार है. लेकिन इसमें ऊर्जा और बंदरगाहों के बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ ब्लैक सी की स्थिति को भी शामिल करना होगा.रूस और यूक्रेन के बीच जारी संघर्ष का असर भारत तक भी पहुंच रहा है. ब्लैक सी में व्यावसायिक जहाजों पर हमलों ने अनाज की सप्लाई को प्रभावित किया है. भारत के लिए रूसी ऊर्जा की आवाजाही भी बेहद अहम है. रिपोर्ट के मुताबिक ब्लैक सी के बंदरगाहों से भारत आने वाली रूसी ऊर्जा की हिस्सेदारी करीब 30 प्रतिशत है. व्यावसायिक जहाजों पर हमलों का एक और सीधा असर भारतीय नागरिकों पर पड़ा है. हालिया हमलों में पांच भारतीय नाविकों की मौत हुई है. इसके बाद भारत लगातार व्यावसायिक जहाजों को निशाना बनाने से रोकने की मांग करता रहा है. जयशंकर ने भी यूक्रेन के विदेश मंत्री के साथ बातचीत में भारतीय नाविकों और ईंधन. खाद्य तथा उर्वरक की सप्लाई से जुड़े मुद्दे उठाए थे.
युद्ध से आगे की सोच में है भारत का फायदा?
भारत के प्रस्ताव को सिर्फ रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध रोकने की कोशिश के तौर पर देखना पूरी तस्वीर नहीं होगी. ब्लैक सी से ऊर्जा और खाद्य सामग्री की आवाजाही जारी रहने का असर वैश्विक बाजार पर भी पड़ता है. सप्लाई बाधित होने पर कीमतों और माल ढुलाई पर दबाव बढ़ सकता है. इसका असर खासकर विकासशील देशों पर पड़ता है.यही वह जगह है जहां अफ्रीका और रूस-यूक्रेन दोनों मुद्दे एक-दूसरे से जुड़ते दिखाई देते हैं. ग्लोबल साउथ के देशों को ईंधन, खाद और उर्वरक की स्थिर सप्लाई चाहिए. भारत इसी मुद्दे को अपनी कूटनीति में प्रमुखता दे रहा है. जयशंकर ने घाना में भी इसी व्यापक चुनौती की ओर इशारा कियातीन देशों की यात्रा में क्या है भारत का एजेंडा?
जयशंकर की घाना, कोट डी आइवर और इथियोपिया यात्रा का उद्देश्य अफ्रीकी देशों के साथ भारत के संबंधों को और मजबूत करना है. इस दौरान व्यापार और आर्थिक संबंध. विकास सहयोग. क्षमता निर्माण और लोगों के बीच संपर्क जैसे मुद्दों पर बातचीत होनी है. क्षेत्रीय और वैश्विक मामलों पर भी चर्चा होगी. इथियोपिया में जयशंकर क्षेत्रीय मिशन प्रमुखों के सम्मेलन की अध्यक्षता भी करेंगे. भारत सरकार के मुताबिक यह यात्रा अफ्रीका के साथ साझेदारी मजबूत करने और ग्लोबल साउथ के साथ भारत की एकजुटता को आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता दिखाती है. जयशंकर ने घाना में भारतीय समुदाय और भारत के मित्रों से भी मुलाकात की. उन्होंने कहा कि भारत को घाना में एक भरोसेमंद और प्रभावी साझेदार के तौर पर देखा जाता है.रणनीतिक स्वायत्तता से ग्लोबल साउथ तक
जयशंकर की मौजूदा कूटनीति में एक पैटर्न साफ नजर आता है. भारत खुद को किसी एक खेमे तक सीमित रखने के बजाय अलग-अलग साझेदारियों के जरिए अपने विकल्प बढ़ाना चाहता है. अफ्रीका में विकास और तकनीक की साझेदारी हो या रूस-यूक्रेन युद्ध में ऊर्जा और समुद्री व्यापार को सुरक्षित रखने की कोशिश. दोनों जगह भारत अपने हितों के साथ व्यापक वैश्विक जरूरतों को जोड़ रहा है. जयशंकर ने घाना में कहा कि मजबूत क्षमताओं वाला भारत ज्यादा गंभीर और प्रभावी साझेदार है. उन्होंने अफ्रीका के साथ पीढ़ियों तक चलने वाली साझेदारी की बात कही. ऐसे में फ्यूल से लेकर फाइनेंस और ब्लैक सी से लेकर अफ्रीका तक भारत की कूटनीति का संदेश यही है कि ग्लोबल साउथ के मुद्दों पर भारत सिर्फ अपनी बात नहीं रखना चाहता. वह समाधान की बातचीत में भी अपनी भूमिका बढ़ाना चाहता है.



