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हम मजबूत रहेंगे तो कोई संकट हमें लील नहीं सकता -संघ के 100 वर्ष त्याग और सेवा की यात्रा: आदरणीय सरसंघचालक जी

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रायपुर: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत छत्तीसगढ़ प्रवास पर हैं. इस दौरान वे आरंग के पास आयोजित हिंदू सम्मेलन कार्यक्रम में शामिल हुए. सम्मेलन को संबोधित करते हुए उन्होंने देश, समाज, संस्कृति और नागरिक कर्तव्यों को लेकर व्यापक दृष्टिकोण रखा. उन्होंने कहा कि आज संकटों की चर्चा बहुत होती है, लेकिन उनके समाधान हमारे अपने हाथ में हैं. यदि समाज और व्यक्ति स्वयं सशक्त रहेंगे, तो किसी भी संकट की यह ताकत नहीं कि वह हमें समाप्त कर सके.

आदरणीय सरसंघचालक श्री मोहन भागवत ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने 100 वर्ष पूरे करने जा रहा है. नागपुर के एक मैदान में छोटी-सी शाखा के रूप में शुरू हुआ संघ आज पूरे भारतवर्ष में कार्य कर रहा है. कश्मीर घाटी से लेकर मिजोरम, अंडमान से लेकर कच्छ, उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक जहां भारत है, वहां संघ के स्वयंसेवक समाज सेवा और राष्ट्र निर्माण के कार्य में लगे हुए हैं.
डॉ. हेडगेवार का तप और कार्यकर्ताओं का समर्पण
संघ प्रमुख ने कहा कि संघ की नींव डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने अपने खून-पसीने से रखी थी. उनके बाद भी कार्यकर्ताओं के त्याग और निरंतर परिश्रम से संघ निरंतर आगे बढ़ता रहा. यह सब इसलिए संभव हुआ ताकि हिंदू धर्म, संस्कृति और समाज का संरक्षण करते हुए हिंदू राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति हो सके.

हर संकट का समाधान है
आदरणीय सरसंघचालक श्री मोहन भागवत ने कहा कि आज चाहे बांग्लादेश की स्थिति हो या समाज और परिवार में संस्कारों की कमी, हर जगह संकट दिखाई देता है, लेकिन संकटों का हिसाब लगाने से ज्यादा जरूरी है उनके समाधान पर चर्चा करना. उन्होंने कहा कि व्यक्तिगत और राष्ट्रीय जीवन में जो भी संकट दिखाई देते हैं, उनका उपाय हमारे अपने हाथ में है. यदि हम स्वयं ठीक रहेंगे, तो किसी संकट की यह जुर्रत नहीं कि वह हमें लील जाए.

भारत की सांस्कृतिक शक्ति और संत परंपरा
RSS प्रमुख ने कहा कि भारत दुनिया का सबसे प्राचीन देश है, जिसके पास उच्च विचार, तत्वज्ञान और संतों की परंपरा है. भगवान को साक्षात करने वाले संत आज भी हमारे समाज में उपलब्ध हैं, जो अन्य किसी समाज में नहीं मिलते. संतों का संग पापों को धो देता है, लेकिन केवल उनके विचार सुनकर चले जाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें जीवन में अपनाना जरूरी है.

छह सूत्रों में संस्कृति की रक्षा का आह्वान
मोहन भागवत ने कहा कि भाषा, वेशभूषा, भजन, भवन, भ्रमण और भोजन, ये छह बातें कम से कम घर के भीतर अपनी होनी चाहिए. उन्होंने मातृभाषा बोलने पर विशेष जोर दिया और कहा कि जिस प्रांत में रहते हैं, वहां की भाषा भी सीखनी चाहिए. साथ ही पारंपरिक वेश, पूजा-पाठ और सांस्कृतिक आचरण को जीवन का हिस्सा बनाने की आवश्यकता है.

स्वदेशी और स्वावलंबन से मजबूत होगा देश
अपने संबोधन में मोहन भागवत ने स्वदेशी को अपनाने का आह्वान किया. उन्होंने कहा कि अपने देश में बना माल खरीदना चाहिए, इससे रोजगार बढ़ेगा और देश आत्मनिर्भर बनेगा. यदि कोई वस्तु देश में उपलब्ध नहीं है, तो मजबूरी में उसे बाहर से खरीदा जा सकता है, लेकिन अपनी शर्तों पर और सीमित रूप में.

भेदभाव, नशा और पर्यावरण पर चिंता
मोहन भागवत ने समाज के सामने मौजूद चुनौतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि अलगाववाद और भेदभाव को बाहर फेंकना होगा. नशे की प्रवृत्ति से बचने के लिए परिवार के सदस्यों के बीच संवाद जरूरी है. इसके साथ ही पर्यावरण संरक्षण और ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्याओं पर भी समाज को गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है.

संविधान, नियम और नागरिक कर्तव्यों का पालन जरूरी
अपने भाषण के अंत में संघ प्रमुख ने नियम-कानून और संविधान के पालन पर विशेष जोर दिया. उन्होंने कहा कि भारत का संविधान हमारे अपने लोगों द्वारा बनाया गया है और यह देश के मानस से निकला है. इसलिए नागरिकों को समय पर टैक्स भरना चाहिए, ट्रैफिक नियमों का पालन करना चाहिए, लाल बत्ती पर रुकना चाहिए और तय नियमों का सम्मान करना चाहिए। एक जिम्मेदार नागरिक बनना ही सशक्त राष्ट्र की सबसे बड़ी नींव है.

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