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अपनी बात – धुरंधर की सफलता पर धुंध फ़ैलाने की कोशिश क्यों ? भारतीय सिनेमा ने हाल के दिनों में करवट सी ली है.

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पाकिस्तान परस्ती और भाईजान को शक्तिशाली बनाते हुए भारतीय जनमानस को वामपंथी पोषित निर्माताओं ने वह परोसा जिसे खाकर उन्हें लगने लगा था कि हिन्दू कौम या माथे पर बिंदी टीका लगाना एक अपराध सा है.
बहुत से लोग प्रगतिशीलता की आड़ में कब देश विरोधी गतिविधियां करते रहे उन्हें स्वयं पता नहीं चला, भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशा अल्ला से लेकर कश्मीर की आज़ादी तक और जितने अफजल मारोगे की ऊँची आवाजों तक देशद्रोह की गतिविधियों तक इन्हे कोई जबाब देने वाला नहीं था, अभिव्यक्ति की आज़ादी और सोरोस सहित अंडरवर्ल्ड के पैसे इन्हे लगातार सिंचित करते गए.
इस घटिया सोच की नाक में नकेल डालते हुए कुछ राष्ट्रवादी सिनेमा निर्माताओं ने हाल में राष्ट्रहित में सच्ची घटनाओं पर आधारित सिनेमा बनाना प्रारम्भ किया, “उरी” और अब “धनुर्धर”बना कर उस सोच की चूलें हिला दी जो ये सोचते थे कि भारत की जनता भेड है और इन्हे हांकते रहो. धनुर्धर जैसे ही परदे पर आई, इन लगा इन कीड़ों की बाम्बियों में किसी ने मिटटी का तेल डाल दिया है, ये बिलबिलाते हुए निकले धनुर्धर का विरोध करते उसके बारे में भ्रामक प्रचार करते और ये प्रचार कुछ फिल्म समीक्षक, ध्रुव राठी यहाँ तक की ह्रितिक रौशन सहित बहुत से उन नामों ने किया जिन्हे शायद जनमानस हिन्दू समझता है, और इनके विरोध के के बाद जनता ने इनकी लंका लगा दी. ये करवट आज़ाद हिंदुस्तान में जरुरी थी क्योकि हमारे युवा को मुगलों का इतिहास पढ़ा पढ़ा कर ही राठी और हलकट माफ़ करिये ह्रितिक जैसी पौध पैदा हुई. आज का युवा हिंदुस्तान में और हिंदुस्तान के बाहर धनुर्धर को देखकर पाकिस्तान और हमारे कुछ नेताओं के नेतृत्व पर अपना आक्रोश व्यक्त कर रहा है और ये चिंतन ही हमारे राष्ट्र को चाहिए था.
हमारे मंदिरों पर कब्जे,हमारी परम्पराओं का दमन और हिन्दू धर्म को दबाने या ख़त्म करने की लगातार कुचेष्टा ने आधे राष्ट्र की उस मानसिकता की सरकारें बदल दी, बंगलादेशी, रोहिंग्या और अवैध लोगों के प्रति जागरूकता पैदा कर दी और उसका परिणाम ये हुआ की आज उन्हें भगाने हिन्दू जग उठा, भारतीय परंपरा का परिचायक माथे पर तिलक और बिंदियां गर्व से लगाई और दिखाई देने लगी. हमारे मंदिरों पर भक्तों की भीड़ उमड़ने लगी और आज हर कोई हिन्दू धर्म के या उसके त्योहारों के बारे में बोलने से पहले विचार करता है कि कहीं उन पर जूता न पड़ जाए.
धनुर्धर फिल्म के कुछ संवादों में ये सुनाई आया कि हिन्दू डरपोंक कौम है, २६/११ के हमलों के बाद लगा था कुछ करेंगे लेकिन हा हा हा, ऐसा सोचने वाले और समझने वाले लोग इतिहास भूल गए. इतनी गुलामी और जुल्म के बाद भी हिन्दू ख़त्म नहीं हुए, गजवा इ हिन्द का ख्वाब रखने वाले ये समझ लें कि उनका राहू काल पिछले ११ वर्षों से लगातार चल रहा है और अभी आगे जितना हिन्दू धर्म का विरोध करेंगे उतना लम्बा और चलेगा.फिलहाल बधाई इस करवट के लिए और राष्ट्र चेतना जगाने का प्रयास करने के लिए. वन्दे मातरम्

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