पश्चिम बंगाल एसआईआर में कोलकाता में सबसे बड़ी सफाई हुई है.
जब पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट के विशेष पुनरीक्षण (SIR) की आहट सुनाई दी, तो हर किसी की जुबान पर एक ही बात थी कि शायद गाज मुर्शिदाबाद, मालदा या दिनाजपुर जैसे सीमावर्ती और मुस्लिम बहुल इलाकों पर गिरेगी. कयास लग रहे थे कि घुसपैठ और फर्जी वोटरों का शोर वहां से ही उठेगा. लेकिन चुनाव आयोग का डेटा जब सामने आया, तो उसने सारी सियासी भविष्यवाणियों को ध्वस्त कर दिया.
असली सर्जिकल स्ट्राइक बंगाल के दिल यानी कोलकाता में हुई है. आंकड़े बेहद चौंकाने वाले हैं. इसने कोलकाता की चुनावी डेमोग्राफी की ऐसी तस्वीर पेश की है, जिसने सबको सन्न कर दिया है. वैसे तो पूरे बंगाल से 58 लाख 19 हजार वोटरों के नाम हटाए गए हैं, जो अपने आप में एक बड़ा आंकड़ा है. लेकिन, सबसे बड़ी और गहरी चोट कोलकाता पर लगी है.यहां हर 4 में से 1 वोटर का नाम लिस्ट से गायब है.
कोलकाता नॉर्थ: यहां सबसे बड़ी सफाई हुई है. ड्राफ्ट रोल से 26% (25.92%) नाम काट दिए गए हैं. यानी यहां के 15 लाख वोटरों में से करीब 3.90 लाख वोटर अब लिस्ट में हैं ही नहीं.
कोलकाता साउथ: यहां भी कैंची कम नहीं चली. करीब 24% (23.82%) नाम हटाए गए हैं. 9 लाख में से 2.16 लाख से ज्यादा नाम गायब हैं.
आखिर कहां गए ये लाखों लोग?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर क्या है यह खेल? ये 25% लोग कौन थे जो अब तक लिस्ट में थे, लेकिन अब गायब हो गए? क्या ये घोस्ट वोटर्स यानी फर्जी मतदाता) थे जो सालों से फाइलों में जिंदा थे?
डेटा की गहराई में जाएं तो जवाब मिलता है. सिर्फ कोलकाता नॉर्थ में 1.34 लाख लोग ऐसे मिले जो अपने पते पर अनुपस्थित या लापता थे.
करीब 1.26 लाख लोग ऐसे थे जो घर-बार छोड़कर हमेशा के लिए कहीं और बस चुके थे, लेकिन उनका वोट कोलकाता में ही चल रहा था. लाखों नाम ऐसे थे जो दुनिया से जा चुके थे, लेकिन वोटर लिस्ट में जिंदा थे.






